भारत बंद: क्या सच में दलितों के अधिकारों का हनन हो रहा है ?

अपने हक़ के लिए सड़क पर उतरना कितना सही है यही सवाल आज देश के हर कोने से पूछा जा रहा है।क्या सड़क पर भीड़ में आकर बसों को जलने से  रेलगाड़ियों को जलाने से समस्या का समाधान है । SC ST कानून में हुए संशोधन को समाज का एक हिस्सा अपने साथ अन्याय मान रहा है और माने भी क्यों ना आज़ादी के 70 साल बाद भी दलित समाज को हमेशा घृणा की नज़रो से देखा गया है।

1980 में लागू अनुसूचित जाती जनजाति अधिनियम के तहत कानून के द्वारा उन्हें कुछ विशेष प्रावधान के तहत हक़ दिए गए थे लेकिन सुप्रीम कोर्ट के द्वारा एक मुक़दमे की सुनवाई के दौरान ये बदलाव किया फैसला पढ़ते हुए माननीय न्यायधीश ने कहा के किसी दलित के द्वारा की गयी सुचना के आधार पर पुलिस मुल्जिम को गिरफ्तार नहीं कर सकती बल्कि पुलिस को 7 दिन में उस रिपोर्ट की जांच करने के बाद मुल्जिम को न्यायालय में पेश किया जाये।

 

कुछ बुद्धिजीवी इस बदलाव को दलितों के साथ अन्याय समझकर उनके हको की लड़ाई की बात करने लगे यहाँ तक की मौजूदा केंद्रीय सरकार ने उच्चतम न्यायालय में एक प्रार्थना पत्र दाखिल कर पुनर्विचार की वकालत तेज़ कर उनके मसीहा बनने की कोशिश कर रही है।अब एक सवाल जो मेरे और पुरे देश के लोगो में उठ रहा है वो है की यदि पहले ही सरकार अपनी दलीले ठीक से पेश करती तो शायद आज ये माहौल न बन पाता ।

चलिए सरकार का जो काम है वही ठीक से नहीं हो पा रहा है लेकिन इस फैसले में अधिकारों का हनन कहा पर हुआ मान लीजिये एक दलित ने पुलिस में सूचना  है की मुझे मेरे पडोसी ने जातिसूचक शब्द बोले इस फैसले से पहले पुलिस इस सूचना के आधार पर आरोपी को गिरफ्तार कर लेती थी लेकिन न्यायालय के आदेश के बाद अब पुलिस जांच करेगी वाकई ऐसी कोई घटना हुई है और फिर कोई कार्रवाई की जाएगी ।यदि सूचना देने वाला सही है तो भाई परेशान होने वाली  क्या बात है आरोपी पर कार्रवाई होगी लेकिन यदि आपने झूठा इल्ज़ाम लगाकर कोई निर्दोष जेल में भिजवा दिया तो उसके अधिकारों का क्या होगा ।

2  अप्रैल यानी दलितों के द्वारा भारत बंद इस भारत बंद की  सरकार को पिछले 4 दिनों से जानकसरी थी लेकिन सरकार द्वारा किसी भी प्रकार की कोई व्यवस्था नहीं की गयी । यदि सुरक्षा सम्बन्धी किसी भी प्रकार की व्यवस्था की जाती तो शायद करोड़ो की संपत्ति का जो नुक्सान हुआ है वो बच जाता।

भारत बंद के दौरान जो लोग सड़को पर उतरे है ज्यादातर युवक है । सरकार की कोई भी प्रतिक्रिया नहीं आ रही है दलितों को अपना भाई बोलने वाले मोदीजी भी कुछ नहीं बोल पा रहे है केंद्रीय सरकार में बैठे दर्जनों दलित मंत्री वो भी शांत बैठे है।

कांग्रेस के अनुसार इन घटनाओ के पीछे ब्राह्मणवादी सोच है जो दलितों के अधिकारों के बारे कुछ नहीं सोच पा रही है।कौन है इन सब के पीछे क्या वाकई दलित ही इस लड़ाई को लड़ रहे है बाबा साहेब आंबेडकर के विचारो को मानने वाले क्या सच में संविधान के अनुसार अपनी लड़ाई लड़ रहे। इन लोगो का वोट लेकर इनके नाम से राजनीति करने वाले क्या सच में इनके लड़ रहे है या वो भी अपनी चुनावी महत्वाकांक्षाओ को पूरा कर रहे है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here